पंथ होने दो अपरिचित प्राण रहने...
हिमाद्रि तुंग शृंग से प्रबुद्ध...
चाह नहीं मैं सुरबाला के गहनों...
ले चल वहाँ भुलावा देकर मेरे...
खेलूँगी कभी न होली उससे जो नहीं...
सब बुझे दीपक जला लूं घिर रहा तम...
पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ...
कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियों। श्रवण...
धूप सा तन दीप सी मैं! उड़ रहा...
तसवीर तेरी दिल मेरा बहला...
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"माँ कह एक कहानी।" बेटा समझ...
कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर...
काहे को ब्याहे बिदेस, अरे,...
- - भाग १ - - मृदु भावों के अंगूरों...
न तुम मेरे न दिल मेरा न जान-ए-ना-तवाँ...
नीलू की कथा उसकी माँ की कथा से...
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