रामधारी सिंह "दिनकर"

रामधारी सिंह "दिनकर"

है कौन विघ्न ऐसा जग में, टिक सके वीर नर के मग में? खम ठोंक ठेलता है जब नर, पर्वत के जाते पाँव उखड़। मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।

जयशंकर प्रसाद

जयशंकर प्रसाद

जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।। सरल तामरस गर्भ विभा पर, नाच रही तरुशिखा मनोहर। छिटका जीवन हरियाली पर, मंगल कुंकुम सारा ...

रवीन्द्रनाथ ठाकुर

रवीन्द्रनाथ ठाकुर

सुख भरे दिनों में सिर झुकाए तुम्हारा मुख मैं पहचान लूंगा, दुखभरी रातों में समस्त धरा जिस दिन करे वंचना कभी ना करूँ, मैं तुम पर संशय।

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तुम हमारे हो

नहीं मालूम क्यों यहाँ आया ठोकरें...

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