कृष्ण

Subhadra kumari chauhan 275x153.jpg

यह कदंब का पेड़

यह कदंब का पेड़ अगर माँ होता यमुना तीरे।  मैं भी उस पर बैठ कन्हैया बनता धीरे-धीरे।।    ले देतीं यदि मुझे बांसुरी तुम दो पैसे वाली।  किसी तरह नीची हो जाती यह कदंब की डाली।।    तुम्हें नहीं कुछ कहता पर मैं चुपके-चुपके आता।  उस नीची डाली से अम्मा ऊँचे पर चढ़ जाता।।    वहीं बैठ फिर बड़े मजे से मैं बांसुरी बजाता।  अम्मा-अम्मा कह वंशी के स्वर में तुम्हे बुलाता।।    बहुत बुलाने पर भी माँ जब नहीं उतर कर आता।  माँ, तब...

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