ग़ज़ल

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दुआ करो कि ये पौधा सदा हरा ही लगे

दुआ करो कि ये पौधा सदा हरा ही लगे उदासियों से भी चेहरा खिला-खिला ही लगे   ये चाँद तारों का आँचल उसी का हिस्सा है कोई जो दूसरा ओढे तो दूसरा ही लगे   नहीं है मेरे मुक़द्दर में रौशनी न सही ये खिड़की खोलो ज़रा सुबह की हवा ही लगे   अजीब शख़्स है नाराज़ होके हंसता है मैं चाहता हूँ ख़फ़ा हो तो वो ख़फ़ा ही लगे

Chandan das na jee bhar ke dekha 275x153.png

न जी भर के देखा

  कई साल से कुछ ख़बर ही नहीं कहाँ दिन गुज़ारा कहाँ रात की उजालों की परियाँ नहाने लगीं नदी गुनगुनाई ख़यालात की मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई ज़ुबाँ सब समझते हैं जज़्बात की सितारों को शायद ख़बर ही नहीं मुसाफ़िर ने जाने कहाँ रात की मुक़द्दर मेरे चश्म-ए-पुर'अब का बरसती हुई रात बरसात की

Menhdi hasan ranjish hi sahee 275x153.png

रंजिश ही सही

  रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत[1]का भरम रख तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ पहले से मरासिम[2] न सही, फिर भी कभी तो रस्मों-रहे दुनिया ही निभाने के लिए आ किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम तू मुझ से ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिरिया[3] से भी महरूम ऐ राहत-ए-जाँ मुझको रुलाने के लिए आ अब तक दिल-ए-ख़ुशफ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें...

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खेलूँगी कभी न होली

खेलूँगी कभी न होली उससे जो नहीं...

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सब बुझे दीपक जला लूं

सब बुझे दीपक जला लूं घिर रहा तम...

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पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है

पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ...

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हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों

कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियों। श्रवण...

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धूप सा तन दीप सी मैं

धूप सा तन दीप सी मैं!  उड़ रहा...

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