प्रतीक्षा

Dushyant kumar 275x153.jpg

विदा के बाद प्रतीक्षा

परदे हटाकर करीने से रोशनदान खोलकर कमरे का फर्नीचर सजाकर और स्वागत के शब्दों को तोलकर टक टकी बाँधकर बाहर देखता हूँ और देखता रहता हूँ मैं।    सड़कों पर धूप चिलचिलाती है चिड़िया तक दिखायी नही देती पिघले तारकोल में हवा तक चिपक जाती है बहती बहती, किन्तु इस गर्मी के विषय में किसी से एक शब्द नही कहता हूँ मैं।    सिर्फ़ कल्पनाओं से सूखी और बंजर ज़मीन को खरोंचता हूँ जन्म लिया करता है जो ऐसे हालात में उनके...

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