क्यों मुझे तुम खींच लाये? एक गो-पद था, भला था, कब किसी के काम का था? क्षुद्ध तरलाई गरीबिन अरे कहाँ उलीच लाये? एक पौधा था, पहाड़ी पत्थरों में खेलता था, जिये कैसे, जब उखाड़ा गो अमृत से सींच लाये! एक पत्थर बेगढ़-सा पड़ा था जग-ओट लेकर, उसे और नगण्य दिखलाने, नगर-रव बीच लाये? एक वन्ध्या गाय थी हो मस्त बन में घूमती थी, उसे प्रिय! किस स्वाद से सिंगार वध-गृह बीच लाये? एक बनमानुष, बनों में, कन्दरों में, जी रहा था; उसे बलि करने कहाँ...
खेलूँगी कभी न होली उससे जो नहीं...
सब बुझे दीपक जला लूं घिर रहा तम...
पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ...
कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियों। श्रवण...
धूप सा तन दीप सी मैं! उड़ रहा...