सृजन

Kedarnath mishr prabhat 275x153.jpg

राह में क्षण सृजन का कहीं है पड़ा

रात के खेत का स्वर सितारों-जड़ा बीचियों में छलकती हुई झीलके दीप सौ-सौ लिए चल रही है हवा बांध ऊंचाइयां पंख में राजसी स्वप्न में भी समुद्यत सजग है लवा राह में क्षण सृजन का कहीं है पड़ा व्योम लगता कि लिपिबद्ध तृणभूमि है चांदनी से भरी दूब बजती जहां व्योम लगता कि हस्ताक्षरित पल्लवी पंखवाली परी ओस सजती जहां ओढ़ हलका तिमिर शैली प्रहरी खड़ा

1 275x153.jpg

सर्जना के क्षण

एक क्षण भर और  रहने दो मुझे अभिभूत  फिर जहाँ मैने संजो कर और भी सब रखी हैं  ज्योति शिखायें  वहीं तुम भी चली जाना  शांत तेजोरूप!    एक क्षण भर और  लम्बे सर्जना के क्षण कभी भी हो नहीं सकते!  बूँद स्वाती की भले हो  बेधती है मर्म सीपी का उसी निर्मम त्वरा से  वज्र जिससे फोड़ता चट्टान को  भले ही फिर व्यथा के तम में  बरस पर बरस बीतें  एक मुक्तारूप को पकते!

सबसे लोकप्रिय

poet-image

खेलूँगी कभी न होली

खेलूँगी कभी न होली उससे जो नहीं...

poet-image

सब बुझे दीपक जला लूं

सब बुझे दीपक जला लूं घिर रहा तम...

poet-image

पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है

पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ...

poet-image

हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों

कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियों। श्रवण...

poet-image

धूप सा तन दीप सी मैं

धूप सा तन दीप सी मैं!  उड़ रहा...

ad-image