विराट्

1 275x153.jpg

चुपचाप

चुप-चाप चुप-चाप झरने का स्वर             हम में भर जाए,   चुप-चाप चुप-चाप शरद की चाँदनी             झील की लहरों पे तिर आए,   चुप-चाप चुप-चाप जीवन का रहस्य, जो कहा न जाए, हमारी             ठहरी आँखों में गहराए,   चुप-चाप चुप-चाप हम पुलकित विराट् में डूबे—             पर विराट् हम में मिल जाए—   चुप-चाप चुप-चाऽऽप…

सबसे लोकप्रिय

poet-image

खेलूँगी कभी न होली

खेलूँगी कभी न होली उससे जो नहीं...

poet-image

सब बुझे दीपक जला लूं

सब बुझे दीपक जला लूं घिर रहा तम...

poet-image

पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ है

पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ...

poet-image

हो कहाँ अग्निधर्मा नवीन ऋषियों

कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियों। श्रवण...

poet-image

धूप सा तन दीप सी मैं

धूप सा तन दीप सी मैं!  उड़ रहा...

ad-image