चुप-चाप चुप-चाप झरने का स्वर हम में भर जाए, चुप-चाप चुप-चाप शरद की चाँदनी झील की लहरों पे तिर आए, चुप-चाप चुप-चाप जीवन का रहस्य, जो कहा न जाए, हमारी ठहरी आँखों में गहराए, चुप-चाप चुप-चाप हम पुलकित विराट् में डूबे— पर विराट् हम में मिल जाए— चुप-चाप चुप-चाऽऽप…
खेलूँगी कभी न होली उससे जो नहीं...
सब बुझे दीपक जला लूं घिर रहा तम...
पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ...
कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियों। श्रवण...
धूप सा तन दीप सी मैं! उड़ रहा...