वायु बहती शीत-निष्ठुर! ताप जीवन श्वास वाली, मृत्यु हिम उच्छवास वाली। क्या जला, जलकर बुझा, ठंढा हुआ फिर प्रकृति का उर! वायु बहती शीत-निष्ठुर! पड़ गया पाला धरा पर, तृण, लता, तरु-दल ठिठुरकर हो गए निर्जीव से--यह देख मेरा उर भयातुर! वायु बहती शीत-निष्ठुर! थी न सब दिन त्रासदाता वायु ऐसी--यह बताता एक जोड़ा पेंडुकी का डाल पर बैठा सिकुड़-जुड़! वायु बहती शीत-निष्ठुर!
खेलूँगी कभी न होली उससे जो नहीं...
सब बुझे दीपक जला लूं घिर रहा तम...
पत्रोत्कंठित जीवन का विष बुझा हुआ...
कहता हूँ¸ ओ मखमल–भोगियों। श्रवण...
धूप सा तन दीप सी मैं! उड़ रहा...