कविताएँ

आओ, नूतन वर्ष मना लें

आओ, नूतन वर्ष मना लें! गृह-विहीन बन वन-प्रयास का तप्त आँसुओं, तप्त श्वास का, एक और युग बीत रहा है, आओ इस पर हर्ष मना लें! आओ, नूतन वर्ष मना लें! उठो, मिटा दें आशाओं को, दबी छिपी अभिलाषाओं को, आओ, निर्ममता से उर में यह अंतिम संघर्ष मना लें! आओ, नूतन वर्ष मना लें! हुई बहुत दिन खेल मिचौनी, बात यही थी निश्चित होनी, आओ, सदा दुखी रहने का जीवन में आदर्श बना लें! आओ, नूतन वर्ष मना लें!

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सृष्टि मिटने पर गर्वीली

रश्मि  चुभते ही तेरा अरुण बान !  बहते कन-कन से फूट-फूट,  मधु के निर्झर से सजग गान !  इन कनक-रश्मियों में अथाह;  लेता हिलोर तम-सिंधु जाग;  बुदबुद् से बह चलते अपार,  उसमें विहगों के मधुर राग;  बनती प्रवाल का मृदुल कूल,  जो क्षितिज-रेख थी कुहर-म्लान !  नव कुन्द-कुसुम से मेघ-पुंज,  बन गए इन्द्रधनुषी वितान;  दे मृदु कलियों की चटख, ताल,  हिम-बिन्दु नचाती तरल प्राण;  धो स्वर्ण-प्रात में तिमिर-गात,  दुहराते अलि निशि-मूक तान !  ...

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मणियों का जूता

मम्मी पर है ऐसा जूता, जिसको लाया इब्न बतूता! यह जूता परियों का जूता, यह जूता मणियों का जूता, मोती की लड़ियों का जूता, ढाई तोले सबने कूता, इसको लाया इब्न बतूता! इस जूते की बात निराली, पल में भरता पल में खाली, बच्चे देख बजाते ताली, अजब-अनूठा है यह जूता, इसको लाया इब्न बतूता! इसमें अपने पाँव फँसाकर, हम जाते हैं नानी के घर, इसे पहनकर भग जाता डर, इसको रोके किसमें बूता, इसको लाया इब्न बतूता!

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न तुम मेरे न दिल मेरा न जान-ए-ना-तवाँ मेरी

न तुम मेरे न दिल मेरा न जान-ए-ना-तवाँ मेरी तसव्वुर में भी आ सकतीं नहीं मजबूरियाँ मेरी न तुम आए न चैन आया न मौत आई शब-ए-व'अदा दिल-ए-मुज़्तर था मैं था और थीं बे-ताबियाँ मेरी अबस नादानियों पर आप-अपनी नाज़ करते हैं अभी देखी कहाँ हैं आप ने नादानियाँ मेरी ये मंज़िल ये हसीं मंज़िल जवानी नाम है जिस का यहाँ से और आगे बढ़ना ये उम्र-ए-रवाँ मेरी

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यह संध्या फूली

यह संध्या फूली सजीली !  आज बुलाती हैं विहगों को नीड़ें बिन बोले;  रजनी ने नीलम-मन्दिर के वातायन खोले;  एक सुनहली उर्म्मि क्षितिज से टकराई बिखरी,  तम ने बढ़कर बीन लिए, वे लघु कण बिन तोले !  अनिल ने मधु-मदिरा पी ली !  मुरझाया वह कंज बना जो मोती का दोना, पाया जिसने प्रात उसी को है अब कुछ खोना;  आज सुनहली रेणु मली सस्मित गोधूली ने; रजनीगंधा आँज रही है नयनों में सोना !

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सहज

सहज-सहज पग धर आओ उतर; देखें वे सभी तुम्हें पथ पर। वह जो सिर बोझ लिये आ रहा, वह जो बछड़े को नहला रहा, वह जो इस-उससे बतला रहा, देखूँ, वे तुम्हें देख जाते भी हैं ठहर उनके दिल की धड़कन से मिली होगी तस्वीर जो कहीं खिली, देखूँ मैं भी, वह कुछ भी हिली तुम्हें देखने पर, भीतर-भीतर?

अब निशा देती निमंत्रण

अब निशा देती निमंत्रण! महल इसका तम-विनिर्मित, ज्वलित इसमें दीप अगणित! द्वार निद्रा के सजे हैं स्वप्न से शोभन-अशोभन! अब निशा देती निमंत्रण! भूत-भावी इस जगह पर वर्तमान समाज होकर सामने है देश-काल-समाज के तज सब नियंत्रण! अब निशा देती निमंत्रण! सत्य कर सपने असंभव!-- पर, ठहर, नादान मानव!-- हो रहा है साथ में तेरे बड़ा भारी प्रवंचन! अब निशा देती निमंत्रण!

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मुझे रोने दो

भाई, छेड़ो नहीं, मुझे खुलकर रोने दो। यह पत्थर का हृदय आँसुओं से धोने दो। रहो प्रेम से तुम्हीं मौज से मजुं महल में, मुझे दुखों की इसी झोपड़ी में सोने दो। कुछ भी मेरा हृदय न तुमसे कह पावेगा किन्तु फटेगा, फटे बिना क्या रह पावेगा, सिसक-सिसक सानंद  आज होगी श्री-पूजा, बहे कुटिल यह सौख्य, दु:ख क्यों बह पावेगा? वारूँ सौ-सौ श्वास एक प्यारी उसांस पर, हारूँ अपने प्राण, दैव, तेरे विलास पर चलो, सखे, तुम चलो, तुम्हारा कार्य चलाओ, लगे दुखों...

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केशर की, कलि की पिचकारी

केशर की, कलि की पिचकारी पात-पात की गात सँवारी । राग-पराग-कपोल किए हैं, लाल-गुलाल अमोल लिए हैं तरू-तरू के तन खोल दिए हैं, आरती जोत-उदोत उतारी- गन्ध-पवन की धूप धवारी । गाए खग-कुल-कण्ठ गीत शत, संग मृदंग तरंग-तीर-हत भजन-मनोरंजन-रत अविरत, राग-राग को फलित किया री- विकल-अंग कल गगन विहारी ।

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बदरिया थम-थमकर झर री !

बदरिया थम-थनकर झर री ! सागर पर मत भरे अभागन गागर को भर री ! बदरिया थम-थमकर झर री ! एक-एक, दो-दो बूँदों में बंधा सिन्धु का मेला, सहस-सहस बन विहंस उठा है यह बूँदों का रेला। तू खोने से नहीं बावरी, पाने से डर री ! बदरिया थम-थमकर झर री! जग आये घनश्याम देख तो, देख गगन पर आगी, तूने बूंद, नींद खितिहर ने साथ-साथ ही त्यागी। रही कजलियों की कोमलता  झंझा को बर री ! बदरिया थम-थमकर झर री !

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