कविताएँ

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उत्साह

बादल, गरजो!-- घेर घेर घोर गगन, धाराधर जो! ललित ललित, काले घुँघराले, बाल कल्पना के-से पाले, विद्युत-छबि उर में, कवि, नवजीवन वाले! वज्र छिपा, नूतन कविता फिर भर दो:-- बादल, गरजो! विकल विकल, उन्मन थे उन्मन, विश्व के निदाघ के सकल जन, आये अज्ञात दिशा से अनन्त के घन! तप्त धरा, जल से फिर शीतल कर दो:-- बादल, गरजो!

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प्रेयसी

घेर अंग-अंग को लहरी तरंग वह प्रथम तारुण्य की, ज्योतिर्मयि-लता-सी हुई मैं तत्काल घेर निज तरु-तन। खिले नव पुष्प जग प्रथम सुगन्ध के, प्रथम वसन्त में गुच्छ-गुच्छ। दृगों को रँग गयी प्रथम प्रणय-रश्मि- चूर्ण हो विच्छुरित विश्व-ऐश्वर्य को स्फुरित करती रही बहु रंग-भाव भर शिशिर ज्यों पत्र पर कनक-प्रभात के, किरण-सम्पात से। दर्शन-समुत्सुक युवाकुल पतंग ज्यों विचरते मञ्जु-मुख गुञ्ज-मृदु अलि-पुञ्ज मुखर उर मौन वा स्तुति-गीत में हरे। प्रस्रवण झरते...

Makhanlal chaturvedi 275x153.jpg

उपालम्भ

क्यों मुझे तुम खींच लाये? एक गो-पद था, भला था, कब किसी के काम का था? क्षुद्ध तरलाई गरीबिन अरे कहाँ उलीच लाये? एक पौधा था, पहाड़ी पत्थरों में खेलता था, जिये कैसे, जब उखाड़ा गो अमृत से सींच लाये! एक पत्थर बेगढ़-सा पड़ा था जग-ओट लेकर, उसे और नगण्य दिखलाने, नगर-रव बीच लाये? एक वन्ध्या गाय थी हो मस्त बन में घूमती थी, उसे प्रिय! किस स्वाद से सिंगार वध-गृह बीच लाये? एक बनमानुष, बनों में, कन्दरों में, जी रहा था; उसे बलि करने कहाँ...

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जो मुखरित कर जाती थीं

जो मुखरित कर जाती थीं मेरा नीरव आवाहन, मैं नें दुर्बल प्राणों की वह आज सुला दी कंपन! थिरकन अपनी पुतली की भारी पलकों में बाँधी निस्पंद पड़ी हैं आँखें बरसाने वाली आँधी! जिसके निष्फल जीवन नें जल जल कर देखी राहें निर्वाण हुआ है देखो वह दीप लुटा कर चाहें! निर्घोष घटाओं में छिप तड़पन चपला सी सोती झंझा के उन्मादों में घुलती जाती बेहोशी! करुणामय को भाता है तम के परदों में आना हे नभ की दीपावलियों! तुम पल भर को बुझ जाना!

Aarsi prasad singh 275x153.jpg

निर्वचन

चेतना के हर शिखर पर हो रहा आरोह मेरा।  अब न झंझावात है वह अब न वह विद्रोह मेरा।  भूल जाने दो उन्हें, जो भूल जाते हैं किसी को।  भूलने वाले भला कब याद आते हैं किसी को?  टूटते हैं स्वप्न सारे, जा रहा व्यामोह मेरा।  चेतना के हर शिखर पर हो रहा आरोह मेरा।  ग्रीष्म के संताप में जो प्राण झुलसे लू-लपट से,  बाण जो चुभते हृदय में थे किसी के छल-कपट से!  अब उन्हीं चिनगारियों पर बादलों ने राग छेड़ा।  चेतना के हर शिखर पर हो रहा आरोह मेरा।  जो धधकती...

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मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!

[ सीमा ही लघुता का बन्धन है अनादि तू मत घड़ियाँ गिन ...] मधुर-मधुर मेरे दीपक जल! युग-युग प्रतिदिन प्रतिक्षण प्रतिपल प्रियतम का पथ आलोकित कर! सौरभ फैला विपुल धूप बन मृदुल मोम-सा घुल रे, मृदु-तन! दे प्रकाश का सिन्धु अपरिमित, तेरे जीवन का अणु गल-गल पुलक-पुलक मेरे दीपक जल! तारे शीतल कोमल नूतन माँग रहे तुझसे ज्वाला कण; विश्व-शलभ सिर धुन कहता मैं हाय, न जल पाया तुझमें मिल! सिहर-सिहर मेरे दीपक जल! जलते नभ में देख असंख्यक स्नेह-हीन...

Gopaldasneeraj 275x153.jpg

तुम्हारे बिना आरती का दीया यह

तुम्हारे बिना आरती का दीया यह न बुझ पा रहा है न जल पा रहा है। भटकती निशा कह रही है कि तम में दिए से किरन फूटना ही उचित है, शलभ चीखता पर बिना प्यार के तो विधुर सांस का टूटना ही उचित है, इसी द्वंद्व में रात का यह मुसाफिर  न रुक पा रहा है, न चल पा रहा है। तुम्हारे बिना आरती का दिया यह न बुझ पा रहा है, न जल पा रहा है।  मिलन ने कहा था कभी मुस्करा कर हँसो फूल बन विश्व-भर को हँसाओ, मगर कह रहा है विरह अब सिसक कर झरा रात-दिन अश्रु के शव...

स्वप्न से किसने जगाया?

स्वप्न से किसने जगाया? मैं सुरभि हूं।  छोड कोमल फूल का घर, ढूंढती हूं निर्झर। पूछती हूं नभ धरा से- क्या नहीं र्त्रतुराज आया? मैं र्त्रतुओं में न्यारा वसंत, मैं अग-जग का प्यारा वसंत। मेरी पगध्वनी सुन जग जागा, कण-कण ने छवि मधुरस मांगा। नव जीवन का संगीत बहा, पुलकों से भर आया दिगंत। मेरी स्वप्नों की निधि अनंत, मैं र्त्रतुओं में न्यारा वसंत।

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गोधूली अब दीप जगा ले

गोधूली, अब दीप जगा ले! नीलम की निस्मीम पटी पर, तारों के बिखरे सित अक्षर, तम आता हे पाती में, प्रिय का आमन्त्र स्नेह-पगा ले! कुमकुम से सीमान्त सजीला, केशर का आलेपन पीला, किरणों की अंजन-रेखा  फीके नयनों में आज लगा ले! इसमें भू के राग घुले हैं, मूक गगन के अश्रु घुले है, रज के रंगों में अपना तू झीना सुरभि-दुकूल रँगा ले! अब असीम में पंख रुक चले, अब सीमा में चरण थक चले, तू निश्वास भेज इनके हित दिन का अन्तिम हास मँगा ले! किरण-नाल पर घन के...

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बहुत कठिन है डगर पनघट की

  बहुत कठिन है डगर पनघट की। कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी मेरे अच्छे निज़ाम पिया। कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी ज़रा बोलो निज़ाम पिया। पनिया भरन को मैं जो गई थी। दौड़ झपट मोरी मटकी पटकी। बहुत कठिन है डगर पनघट की। खुसरो निज़ाम के बल-बल जाइए। लाज राखे मेरे घूँघट पट की। कैसे मैं भर लाऊँ मधवा से मटकी बहुत कठिन है डगर पनघट की।

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